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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, रद्द हुई उम्मीदवारी पर फिर से होगा विचार!!

युवाओं के लिए राहत भरी खबर, कोर्ट ने दिया दोबारा मौका!!

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, अधिवक्ता रिषभ केसरवानी की पैरवी से अभ्यर्थी को मिली राहत

विधि संवाददाता

प्रयागराज, संयम भारत, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पुलिस भर्ती से जुड़े एक अभ्यर्थी को बड़ी राहत प्रदान की है। कोर्ट ने सिविल पुलिस भर्ती 2023 में रद्द की गई उम्मीदवारी को निरस्त करते हुए मामले में दोबारा विचार करने का आदेश दिया है। यह फैसला युवाओं के लिए एक अहम संदेश माना जा रहा है कि न्यायालय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्णय देता है, माननीय न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया (Court No. 6) की एकल पीठ ने रद्द की गई उम्मीदवारी को निरस्त करते हुए मामले में पुनर्विचार का आदेश दिया। यह आदेश 22 अप्रैल 2026 को पारित किया गया।

इस केस में अधिवक्ता रिषभ केसरवानी ने अभ्यर्थी की ओर से प्रभावी पैरवी करते हुए कोर्ट के सामने यह तथ्य रखा कि जिस आपराधिक मामले के आधार पर उम्मीदवारी रद्द की गई थी, उसमें अभ्यर्थी को बाद में पूरी तरह बरी कर दिया गया है। उनकी दलीलों ने केस की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पूरा मामला 14 अगस्त 2025 के आदेश से जुड़ा है, जिसमें अभ्यर्थी की उम्मीदवारी केवल एक लंबित आपराधिक मामले के आधार पर रद्द कर दी गई थी। हालांकि 24 दिसंबर 2025 को संबंधित अदालत ने उस मामले में अभ्यर्थी को दोषमुक्त घोषित कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि उसके खिलाफ कोई अपराध सिद्ध नहीं हुआ, मामला WRIT – A No. 5734 of 2026, सत्येन्द्र रैकवार बनाम उ०प्र० राज्य व अन्य से संबंधित है, अभ्यर्थी की उम्मीदवारी को 14 अगस्त 2025 को केवल इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि उसके खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित था। याचिका में इस आदेश को चुनौती दी गई थी।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध मामले
अवतार सिंह बनाम यूनियन आंफ इण्डिया का हवाला देते हुए कहा कि यदि अभ्यर्थी ने अपनी जानकारी सही दी है और बाद में बरी हो जाता है, तो उसकी उम्मीदवारी पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल लंबित केस के आधार पर स्थायी रूप से अवसर छीनना न्यायसंगत नहीं है।

अंत में कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि 6 सप्ताह के भीतर नई पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट तैयार की जाए और उसके बाद 4 सप्ताह के अंदर अंतिम निर्णय लिया जाए। साथ ही, पहले जारी किया गया रद्दीकरण आदेश पूरी तरह निरस्त कर दिया गया। इस फैसले में अधिवक्ता रिषभ केसरवानी की मजबूत कानूनी रणनीति और पैरवी निर्णायक साबित हुई।

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