हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्वावधान मे ‘तीर्थराज प्रयाग का पौराणिक महत्व एवं सृष्टि रचना से लेकर आधुनिक काल तक’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन
संयम भारत संवाददाता प्रयागराज।हिन्दुस्तानी एकेडेमी उ0प्र0, प्रयागराज के तत्वावधान में दिनांक 28 जनवरी 2026, बुधवार को पूर्वाह्न 11ः30 बजे गाँधी सभागार, हिन्दुस्तानी एकेडेमी उ0प्र0, प्रयागराज में दो सत्रों में ‘तीर्थराज प्रयाग का पौराणिक महत्व: सृष्टि रचना से लेकर आधुनिक काल तक’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम एकेडेमी परिसर में स्थापित पं0 बालकृष्ण भट्ट, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन एवं सुभद्रा कुमारी चैहान की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ सरस्वती जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम के प्रथम सत्र के प्रारम्भ में एकेडेमी की कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने आमंत्रित अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ, स्मृति चिह्न और शाॅल देकर किया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत करते हुए पायल सिंह ने कहा कि ‘वेदों की स्थापना के बाद ब्रह्मा जी ने यहीं पहला यज्ञ किया, इसलिए प्रयाग नाम पड़ा। सृष्टि का सृजन करने से पहले भी ब्रह्मा जी ने अपना पहला यज्ञ यहीं किया था। ब्रह्मा जी ने अपनी दिव्य दृष्टि से अन्य तीर्थों के साथ प्रयागराज तीर्थ की तुलना की और उसका महत्व आंका, जिसमें उन्होंने पाया कि अन्य तीर्थों के मुकाबले प्रयागराज तीर्थ अधिक भारी है। तब ब्रह्मा जी ने प्रयाग को ही सब तीर्थाे का राजा बना दिया। उसी दिन से सब तीर्थ इनके अधीन रहने लगे और तीर्थराज प्रयाग कहने लगे।’ सगोष्ठी केे प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए डाॅ. उदय प्रताप सिंह, पूर्व अध्यक्ष, हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने कहा कि ‘पुराण भारतीय लोकजीवन की धड़कन है। विज्ञान के लाख विकास के बाद भी यहाँ का जनजीवन पुराणों में फैली धारणाओं से संचालित होता है। पुराणों में लिखा है कि यहाँ के कुंभ में स्नान करने से हजार अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है। जनता के मन में यह विश्वास अडिग है। संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि यह जानते हुए भी कि मरना निश्चित है, कोई भी इसके लिए तैयार नहीं है। अतः देवासुर संग्राम में जयंत द्वारा अमृत कलश लेकर भागना, उसकी कुछ बुंदों का प्रयाग की धरती पर गिरना और उसे प्राप्त कर अमर हो जाने वाला विश्वास ही यहाँ को खींच लाता है। उजजैन, हरिद्वार और नासिक के कुंभ भी इसी विश्वास से जुड़े हैं। 2025 में लगने वाला कुंभ इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। जहाँ छाछठ करोड़ लोगों ने स्नान किया।’ प्रथम सत्र के मुख्य वक्ता प्रो. विवेकानंद तिवारी, अध्यक्ष अम्बेडकर पीठ, हिमांचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘प्रयाग का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। यह तीर्थ बहुत प्राचीन काल से प्रसिद्ध है और संगम के जल से प्राचीन काल में राजाओं का अभिषेक होता था। इस बात का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में है। वन जाते समय श्रीराम प्रयाग में भारद्वाज ऋषि के आश्रम पर होते हुए गए थे। सबसे प्राचीन एवं प्रामाणिक पुराण मत्स्य पुराण के 102 अध्याय से लेकर 107 अध्याय तक में इस तीर्थ के महात्म्य का वर्णन है। उसमें लिखा है कि प्रयाग प्रजापति का क्षेत्र है जहां गंगा और यमुना बहती हैं। माघ महीने में यहां सब तीर्थ आकर वास करते हैं। इसलिए इसे तीर्थराज भी कहते है। राष्ट्रीय संगोष्ठी के विशिष्ट वक्ता डाॅ. अनुपम परिहार ने कहा कि ’तीर्थराज प्रयाग केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं, संस्कृतियों और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत केंद्र है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम जिस प्रकार नदियों को एक करता है, उसी प्रकार प्रयाग भारतीय जीवन-दृष्टि को एक सूत्र में बाँधता है।’ संगोष्ठी के दूसरे विशिष्ट वक्ता प्रो. जयराम त्रिपाठी, हेमवंती नन्दन बहुगुणा राजकीय डिग्री काॅलेज, प्रयागराज ने कहा कि ‘गंगा के उदृगम से प्रारम्भ शब्द प्रयाग – पंच प्रयाग को पूर्णता प्राप्त होती है सम्राट हर्षवर्धन के प्रयाग आने और पावन अवसर पर (जिसे महामोक्ष परिषद् कहा गया है) अपना सर्वस्व दान करने का वर्णन इतिहास में है।’ संगोष्ठी के विशिष्ट वक्ता प्रो. ललित कुमार सिंह, महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय, सतना ने कहा कि ‘कुंभ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या मेला नहीं है भारतीय सभ्यता और संस्कृति का उदाहरण है। यह सामाजिक धार्मिक आर्थिक दार्शनिक एवं सभ्यतागत विमर्श का केंद्र भी है। दुनिया की सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुई किंतु हमारे देश में सभ्यताओं के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विकास के केंद्र में हमारे पवित्र नदियां ही हैं।’ संगोष्ठी के प्रथम सत्र का संचालन करते हुए डाॅ. विनम्रसेन सिंह, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने कहा कि ‘तीर्थराज प्रयाग भारतीय संस्कृति का वह दिव्य केंद्र है, जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का पावन संगम होता है। पुराणों में इसे सृष्टि का आदि-तीर्थ कहा गया है, जहाँ स्वयं ब्रह्मा ने प्रथम यज्ञ संपन्न किया। यह स्थान तप, त्याग और मोक्ष की साधना का प्रतीक माना गया है। प्रयाग में किया गया स्नान जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय करने वाला बताया गया है। इसी कारण प्रयाग को समस्त तीर्थों में श्रेष्ठकृ‘तीर्थराज’कृका गौरव प्राप्त है। कार्यक्रम के दूसरे सत्र क् प्रारम्भ में मचांसीन अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान एकेडेमी के सचिव ने पुष्पगुच्छ, स्मृति चिह्न और शाॅल देकर किया। सत्र की अध्यक्षता कर रहीं प्रो. अचला पाण्डेय, हिन्दी विभाग, बुन्देलखंड विश्वविद्यालय, झांसी ने अपने वक्तव्य में कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने बिल्कुल सही कहा है कि पापों के समूह रूपी हाथी को मारने के लिए सिंह रूप प्रयागराज का प्रभाव कौन कह सकता है? ऋग्वेद और यजुर्वेद में प्रयाग को तपोभूमि और यज्ञ भूमि कहा गया है। ब्रह्मा जी द्वारा प्रथम यज्ञ इसी पुण्य भूमि पर किया गया जिसके कारण इसका नाम प्रयाग हुआ। ब्रह्म पुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण,पद्म पुराण, रामायण, तथा महाभारत सभी ग्रंथों में प्रयागराज का उल्लेख है।’ दूसरे सत्र की मुख्य वक्ता प्रो. सपना गुप्ता, अध्यक्ष भाषा एवं नवीनीकरण विभाग, केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ने कहा कि ‘भारतवर्ष की सांस्कृतिक चेतना तीर्थों के माध्यम से विकसित हुई है। इन तीर्थों में प्रयागराज का स्थान सर्वोपरि है। प्रयागराज भारत की प्राचीनतम सांस्कृतिक एवं धार्मिक नगरी है। जिसे वेदों ,पुराणों ,रामायण, महाभारत तथा उपनिषदों में विशिष्ट स्थान प्राप्त है इसे तीर्थराज कहा गया है। यह नगर सृष्टि काल ही से लेकर आधुनिक भारत तक आध्यात्मिक धार्मिक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से निरंतर महत्वपूर्ण रहा है।’ दूसरे सत्र के विशिष्ट वक्ता डाॅ. रमाकांत राय, पंचायत राज राजकीय महिला पी. जी. काॅलेज, इटावा ने तीर्थराज प्रयाग में स्नान के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रयागराज से भगवान राम के संबंध पर विस्तार से चर्चा की और कहा कि न केवल वन गमन के क्रम में अपितु अयोध्या वापसी के समय भगवान महर्षि भारद्वाज के आश्रम में गए। अयोध्या जाकर पुनः त्रिवेणी में लौटे और भरत के यहां से संदेश आने की प्रतीक्षा की। उन्होंने स्नान को आचार्य कुबेरनाथ राय के शब्दों में पंचम पुरुषार्थ से जोड़कर चर्चा की।’ विशिष्ट वक्ता डाॅ. राकेश कुमार सिंह, हिन्दी विभाग, सत्यवती महाविद्यालय, दिल्ली ने कहा कि ‘सर्वविदित है कि तीर्थराज प्रयाग का महत्व प्राचीन काल से लेकर आज तक बना हुआ है। वस्तुतः प्रयागराज भारतीय सनातन संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। माँ गंगा , यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम पर स्थित यह नगरी ‘सृष्टि के प्रथम यज्ञ’ (पौराणिक ग्रंथों में) से लेकर स्वाधीनता संग्राम और समसायिक चुनौतियों की साक्षी रहा है।’ प्रो. त्रिभुवन सिंह, महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय, सतना ने कहा कि ‘कुंभ के आध्यात्मिक और नैतिक संदेश मुनष्य को उसके आन्तरिक जीवन की ओर आमुख करता है। आत्म परिक्षण पर बल देता है, जहाँ व्यक्ति अपने जीवन की दिशा उद्देश्यों और मूल्यों पर पुनर्विचार करता है। इस सत्र का संचालन डाॅ. राघवेन्द्र सिंह मथुरा ने किया। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन एकेडेमी को कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने किया। इस अवसर पर शौरभ उपाध्याय शोध छात्र इलाहााबाद विश्वविद्यालय ने अपना शोध पत्र का वाचन किया। इलाहाबाद कार्यक्रम में उपस्थित विद्धानों में प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह, निदेशक, गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक संस्थान, प्रयागराज, डाॅ. कल्पना वर्मा, डाॅ. विरेन्द्र कुमार तिवारी, सुनील दानिश, गोपालजी पाण्डेय, डाॅ. अनिल कुमार सिंह, डाॅ. संजय कुमार सिंह, आकाश तिवारी, डाॅ. आकाश मोर्या, ललित कुशवाहा, एम. एस. खान सहित शोधार्थी एवं शहर के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

