भदोही में शिक्षा विभाग की मनमानी उजागर, भू-माफिया और अधिकारियों की साज़िश पर सूचना आयोग का सबसे बड़ा प्रहार!
विशेष संवाददाता भदोही, संयम भारत, उत्तर प्रदेश के भदोही जनपद में बेसिक शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर कठघरे में है। राज्य सूचना आयुक्त ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी भदोही को कड़ा निर्देश देते हुए कहा है कि अपीलार्थी द्वारा मांगी गई सभी सूचनाएँ 15 दिवस के भीतर अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराई जाएँ। आयोग ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि निर्धारित समय सीमा में सूचना नहीं दी गई, तो सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 20(1) के अंतर्गत ₹25,000 तक का अर्थदंड लगाया जाएगा। आयोग के इस सख्त रुख से विभाग में हड़कंप मच गया है, क्योंकि मामले में कई गंभीर अनियमितताओं का खुलासा होना बाकी है।मामले की जड़ भू-माफिया और विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत तक जाती है। आरोप है कि ज्ञानपुर तहसील में सक्रिय रिटायर लेखपाल कमला शंकर मिश्रा ने सरकारी जमीनों—जिनमें तालाब की भूमि, ग्राम समाज की भूमि, पंचायत भवन सहित कई विवादित जमीनें शामिल हैं—पर अवैध कब्जा कर उन्हें अपने नाम संशोधित कराया। इन्हीं कथित फर्जी कागजातों का उपयोग कर उसने बेसिक शिक्षा विभाग से तीन विद्यालयों की मान्यता ले ली। जबकि स्पष्ट नियम है कि जब तक किसी विद्यालय की भूमि की वैध रजिस्ट्री या स्वामित्व कागजात विभाग में जमा न किए जाएँ, तब तक विद्यालय को मान्यता नहीं दी जा सकती। इसके बावजूद विभाग ने मान्यता जारी कर दी, जो भ्रष्टाचार का बड़ा संकेत माना जा रहा है।सूचना आयुक्त के समक्ष प्रस्तुत अपील में यह भी कहा गया कि शिकायतकर्ता द्वारा बार-बार की गई शिकायतों के बावजूद शिक्षा विभाग ने कोई कार्रवाई नहीं की। उल्टा RTI में मांगी गई सूचनाएँ देने से विभाग पूरी तरह बचता रहा। जन सूचना अधिकारी (BSA कार्यालय) से आयोग ने कई बार जवाब तलब किया, लेकिन विभाग के अधिकारी सुनवाई में उपस्थित भी नहीं हुए। यह आचरण सीधे-सीधे इस ओर इंगित करता है कि विभाग उन ‘वंचित सूचनाओं’ को छुपा रहा है, जिनसे भू-माफिया को मिली फर्जी मान्यता का मामला और अधिक उजागर हो सकता है।गंभीर बात यह है कि उक्त भू-माफिया के खिलाफ दर्जनों शिकायतें पहले से लंबित हैं। आरोप है कि उसने किसानों, दलितों और दिव्यांग व्यक्तियों की जमीनें जाति बदलकर, दबाव बनाकर और फर्जी कागजात तैयार कर हड़प लीं। इन सभी मामलों की सरकारी स्तर पर जांच भी चल रही है। जांच के दौरान यह खुलासा हुआ कि जिस विद्यालय के नाम से मान्यता ली गई है, उस विद्यालय के नाम पर कोई भूमि रजिस्ट्री है ही नहीं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि शिक्षा विभाग ने बिना आधार दस्तावेजों के विद्यालय को मान्यता कैसे दे दी? यह विभागीय स्तर पर बड़े भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और राजनीतिक संरक्षण की ओर इशारा करता है।बेसिक शिक्षा विभाग भदोही में भ्रष्टाचार के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। शिक्षकों के उत्पीड़न, ट्रांसफर-पोस्टिंग में मनमानी, और फर्जी विद्यालयों को मान्यता देने जैसे मामले लगातार सामने आते रहे हैं। लेकिन इस बार मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुँच चुका है, और अब विभाग से सख्त जवाब मांगा गया है। लोगों का कहना है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई और दोषी अधिकारियों तथा भू-माफिया के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो आम जनता का शिक्षा विभाग और कानून व्यवस्था पर से भरोसा उठ जाएगा। फिलहाल सूचना आयुक्त की नोटिस के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि BSA भदोही और संबंधित अधिकारी आयोग के समक्ष क्या जवाब दाखिल करते हैं और 28 अक्टूबर 2025 की अगली सुनवाई में क्या तथ्य सामने आते हैं।

