जाति के आधार पर शिक्षा मत बांटिए, डिबेट में उठा बड़ा सवाल
शिक्षा का मंदिर बने एकता का प्रतीक, जाति का अखाड़ा नहीं – यूजीसी नियमों पर देशभर में मचा महादंगल”
विशेष संवाददाता
प्रयागराज, संयम भारत, एबीपी न्यूज़ की वरिष्ठ एंकर एवं संपादक चित्रा त्रिपाठी ने यूजीसी के नए नियमों को लेकर अपने जनहित शो में तीखी बहस छेड़ दी। डिबेट के दौरान उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षा का माहौल जातिगत आधार पर विभाजित नहीं होना चाहिए। उनका तर्क था कि शिक्षा का उद्देश्य प्रतिभा को निखारना है, न कि छात्रों को अगड़ा-पिछड़ा के खांचे में बांटना। उन्होंने आशंका जताई कि यदि नए नियमों को उसी स्वरूप में लागू किया गया तो कैंपस में पढ़ाई से ज्यादा विवाद और तनाव बढ़ सकता है।
डिबेट में शामिल कई पैनलिस्टों ने भी कहा कि नए यूजीसी नियमों से शैक्षणिक संस्थानों में टकराव की स्थिति बन सकती है। कुछ वक्ताओं ने इसे सामान्य वर्ग के छात्रों के भविष्य पर प्रभाव डालने वाला बताया, तो वहीं अन्य ने तर्क दिया कि सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना भी जरूरी है। कार्यक्रम में यह सवाल प्रमुखता से उठा कि क्या ये नियम सामाजिक संतुलन स्थापित करेंगे या नई खाई पैदा करेंगे।
इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी अलग-अलग राय रखी। केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan ने स्पष्ट किया कि सरकार किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव नहीं होने देगी। वहीं कुछ विपक्षी नेताओं ने कहा कि नियमों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है ताकि शिक्षा व्यवस्था पर नकारात्मक असर न पड़े। बहस के दौरान यह भी चर्चा हुई कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुराने नियमों को बनाए रखने के निर्देश के बाद स्थिति और संवेदनशील हो गई है।
डिबेट में यह तर्क भी सामने आया कि आर्थिक रूप से कमजोर, असहाय, दलित, ओबीसी और दिव्यांग वर्ग के छात्रों को सुविधाएं देकर उनका आत्मविश्वास बढ़ाना चाहिए, ताकि वे राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकें। परंतु शिक्षा को पूरी तरह जातिगत आधार पर परिभाषित करना दीर्घकालिक रूप से समाज के लिए घातक हो सकता है। विशेषज्ञों ने कहा कि कैंपस का वातावरण शांत और तनावमुक्त रहना चाहिए, तभी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा संभव है।
कार्यक्रम में यह सवाल भी गूंजा कि क्या नए नियम समाज को दो हिस्सों में बांट देंगे? क्या इससे छात्रों में असुरक्षा की भावना बढ़ेगी? और क्या राजनीतिक दल इस मुद्दे को चुनावी नजरिये से देख रहे हैं? इन सवालों ने बहस को और तीखा बना दिया। विभिन्न संगठनों द्वारा देश के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन की खबरों ने भी विषय को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना दिया है।
अंत में एंकर ने कहा कि यूजीसी का मूल उद्देश्य उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और समानता सुनिश्चित करना है, न कि विभाजन की रेखाएं खींचना। उन्होंने जोर दिया कि विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले सभी छात्र पहले विद्यार्थी हैं, उनकी पहचान जाति से नहीं बल्कि उनकी प्रतिभा और मेहनत से होनी चाहिए।

