मणिकर्णिका घाट का पुनर्निर्माण मंदिर तोड़ना नहीं, परंपरा और सुविधा का सम्मान है
विनय मिश्र प्रयागराज। संयम भारत,आजकल घाट को लेकर चारों ओर शोर शराबा मचा हुआ है. लोग हल्ला मचा रहे हैं कि मंदिर तोड़े जा रहे हैं. जबकि सच्चाई यह है कि मणिकर्णिका घाट को तोड़ा जा रहा है. यदि किसी घाट को या किसी चबूतरे को तोड़कर वहां फिर से और सुंदर चबूतरा या घाट बनाया जाए, तो यह शास्त्र सम्मत है. ऐसे कार्य की आलोचना करने का कोई तुक ही नहीं है. घाट पर मंदिर होना ही नहीं चाहिए. वहां जिन लोगों ने मंदिर बनाया. उसका दोष निवारण करना शास्त्रों में उचित बताया गया है. सरकार अगर यह दोष दूर कर रही है. वहां पर सुन्दर घाट बनवा रही है. हिंदू समाज के हित में यह सराहनीय कार्य है. वहां एक भव्य घाट बनेगा. लोगों के आकर्षण का केंद्र होगा. बाहर से आने वाली यात्रियों को सुविधा मिलेगी. तो इसमें गलत क्या है?सरकार का साध्य क्या है? यह देखना चाहिए! लेकिन इसे लेकर जनमानस के बीच भ्रम फैलाना सर्वथा उचित नहीं है. कहीं भी किसी भी गांव में जो नदी के किनारे पर स्थित हो. वहां आप जाइए. घाट से लेकर उस स्थान तक जहां तक नदी के बाढ का पानी पहुंचता है. ,वहां मंदिर नहीं बनाया जाता. मंदिर हमेशा ऐसी जगह पर बनाते हैं. जो बाढ़ क्षेत्र से कम से कम से कम 10 या 20 फीट ऊपर हो. जहां पूजा के समय खड़े होने पर पूरा नदी से लेकर गांव बस्ती का दृश्य दिखाई दे. तो इस तरह के मुद्दे को लेकर के हिंदू समाज के बीच भ्रम की स्थिति उत्पन्न करना सर्वथा उचित नहीं है. मंदिर- मंदिर सुनकर लोग घबरा जाते हैं कि मंदिर तोड़ा जा रहा है. जबकि सच्चाई यह है की घाट का पुनर्निर्माण किया जा रहा है. पुनर्निर्माण के दौरान पुराने निर्माण तो टूटते ही है. महारानी अहिल्याबाई ने जब वहां घाट बनवाया होगा. तो उसे समय वहां पुराने मंदिर रहे होंगे. उनको भी हटाया गया होगा. मंदिर को हटाना और तोड़ना दोनों अलग-अलग चीज हैं. वहां मंदिरों को हटाकर दूसरी जगह स्थापित किया जा रहा है. कोई मंदिर नहीं तोड़ा जा रहा है. गलती से कोई मूर्ति यदि टूट गई है. तो उसे भी से सम्मान से रखा जा रहा है. बात का बतंगड़ बनाना राजनीतिक स्वार्थ के लिए जनता को बरगलाना गलत प्रवृत्ति है. इस प्रवृत्ति से समाज में तनाव बढ़ता है. पहले मामले की स्थिति जानना चाहिए. पूरी सच्चाई समझने के बाद फिर राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को कोई बयानबाजी करना चाहिए. इस मामले पर राष्ट्रीय स्तर पर बयान देना समझ में नहीं आता. लोगों ने मंदिर बनाया तो क्या सोचकर बनाया? भविष्य में अगर वह घाट कभी और बड़ा बनेगा! तो फिर पुन निर्माण होगा. यदि इस दौरान किसी मूर्ति को कोई क्षति पहुंची है. तो उन मूर्तियों को सहेज कर रखा जाना चाहिए. इसे लेकर पूरे देश में हल्ला मचा करके एक समाज के बीच गलत संदेश देना उचित नहीं है. यदि किसी को बहुत अधिक पूजा करनी है. तो वह अपने घर के सामने खाली स्थान पर यज्ञ करें. यज्ञ करना सबसे अच्छी पूजा है. मणिकर्णिका घाट तो घाट के नाम से ही प्रसिद्ध है. तो अगर घाट को और अच्छा बनाया जा रहा है. सुविधाजनक बनाया जा रहा है. वहां बाहर से लोग आते हैं. तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. क्या वहां जो तथाकथित मंदिर तोड़े गए हैं और जो लोग हल्ला मचा रहे हैं. वे कभी वहां पूजा करने गए थे? क्या वहां की स्थिति उन्होंने कभी देखी है? किसी ने दिल्ली में बैठकर कह दिया. मंदिर तोड़े जा रहे हैं! तो पूरे देश में कुछ लोग चिल्लाने लगे की मंदिर तोड़े जा रहे हैं. जबकि लोगों की यह नहीं पता है कि घाट तोड़ा जा रहा है. घाट और चबूतरे तोड़ने के लिए ही बनाए जाते हैं. धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक रूप से देखा जाए तो यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं है. जिसे लेकर पूरे देश में इतना हाय तौबा मचाई जा रही है. अजीज नाजा कव्वाल की तरह कव्वाली वाली ड्रेस पहन कर कुछ लोग इस मामले को सांप्रदायिक मोड देना चाहते हैं. जो सर्वथा उचित नहीं है. कव्वाली गाने वाले लोगों को भजन-कीर्तन के बारे में कमेंट नहीं करना चाहिए. हिंदू समाज का वह स्थान है. वहां पर पुनर्निर्माण कराया जा रहा है. उस निर्माण के दौरान यदि कुछ मूर्तियां या मंदिरों को क्षति पहुंच रही है. तो उन्हें दूसरी ओर स्थापित कर दिया जाए. इसमें कौन सी ऐसी समस्या आ गई है कि इसको लेकर के धर्म खतरे में पड़ गया है और हिंदुओं के मान सम्मान पर बात आ गई है. जिसको पूजा करना है. वह घर में भी कर सकता है. घर के बगल में मंदिर है. वहां कर सकता है. पूजा-पाठ कोई करता नहीं. कव्वाली वाली ड्रेस पहनकर मंदिर-मंदिर चिल्लाते हैं. यह सबसे बड़ी समस्या है. राहुल गांधी और ऐसा बयान देते हैं कि मानो वे सवेरे उठकर मंदिर में ही जाकर उनकी दिनचर्या शुरू होती हो. अखिलेश यादव रोज किसी मंदिर में जाकर प्रार्थना करते हैं. भजन कीर्तन करते हैं. किसी धर्म स्थान पर जो लोग कभी दिखाई नहीं देते. वही लोग सबसे ज्यादा हल्ला मचा रहे हैं कि मंदिर तोड़ा जा रहा है. जबकि सच्चाई है कि वहां कोई मंदिर नहीं तोड़ा गया है. पुनर्निर्माण हो रहा है और इस निर्माण को मंदिर तोड़ने जैसा कहना गलत है. सनसनी फैलाकर सस्ती लोकप्रियता हासिल करना उचित नहीं है.( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

