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भदोही में भू-माफिया को बचाने में क्यों जुटा लोक निर्माण विभाग?

राज्य सूचना आयोग का सख्त निर्देश – 15 दिन में सूचना दो वरना लगेगा ₹25,000 का दंड!

विशेष संवाददाता भदोही के ज्ञानपुर तहसील में भू-माफिया कमला शंकर मिश्रा को बचाने के लिए लोक निर्माण विभाग की संदिग्ध भूमिका सामने आई है। राज्य सूचना आयोग में लंबित अपील की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि विभाग जानबूझकर आवश्यक सरकारी सूचनाएँ उपलब्ध नहीं करा रहा है। आयोग ने कड़े तेवर दिखाते हुए लोक निर्माण विभाग, ज्ञानपुर को 15 दिवस के भीतर समस्त सूचनाएँ उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है, अन्यथा सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 20(1) के तहत ₹25,000 का अर्थदंड लगाया जाएगा।सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि लोक निर्माण विभाग की ओर से न तो जन सूचना अधिकारी उपस्थित हुए और न ही किसी प्रतिनिधि को भेजा गया। आयोग ने कहा कि विभाग की यह हरकत इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं भू-माफिया को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। अपीलार्थी के प्रतिनिधि ने साफ आरोप लगाया कि लोक निर्माण विभाग भू-माफिया की मदद कर रहा है और भ्रामक, असत्य एवं अधूरी सूचनाएँ दे रहा है।राज्य सूचना आयुक्त ने न्यायहित में विभाग को अंतिम अवसर देते हुए चेतावनी जारी की है कि यदि 15 दिन में सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई तो दंडात्मक कार्रवाई निश्चित है। सूचना आयुक्त की सख्ती के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है, क्योंकि आरोप सीधे-सीधे सरकारी रिकॉर्ड में हेराफेरी और भू-माफिया के संरक्षण से जुड़े हुए हैं।भू-माफिया कमला शंकर मिश्रा पर आरोप है कि उसने दिव्यांग दलित मल्लू पुत्र स्वर्गीय शीतला चमार एवं स्व. मनबोध चमार की जमीन हड़पने के लिए जाति बदलकर पासी दिखाने की कूट-रचना की। किसानों का आरोप है कि इस मामले में तहसील प्रशासन, सहायक चकबंदी अधिकारी और कुछ विभागीय कर्मचारी भी उसकी मदद कर रहे हैं, जिसके कारण पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। ग्रामसभा की बैठकों, प्रस्तावों एवं कुटुंब/परिवार रजिस्टर की जांच से भी यह संकेत मिलता है कि कागजातों के साथ बड़ी हेराफेरी हुई है।दिव्यांग मल्लू चमार ने जिलाधिकारी एवं एसपी भदोही को प्रार्थना पत्र भेजकर भू-माफिया कमला शंकर मिश्रा और उसके सहयोगियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। शिकायतकर्ताओं ने कहा है कि उनके परिवार की जमीन गलत जाति दर्शाकर हड़प ली गई है। पीड़ितों ने अपनी जान–माल की सुरक्षा, न्याय और दोषियों के खिलाफ कूटरचित दस्तावेजों पर कार्रवाई की मांग की है। मामला अब राज्य सूचना आयोग की निगरानी में है, और विभागीय अधिकारियों की लापरवाही तथा संदिग्ध भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

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